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डिजिटल अरेस्ट नेटवर्क का खुलासा: 417 करोड़ की ठगी से कैसे बचें

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डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी से सुरक्षा का प्रतीकात्मक AI चित्र
प्रतीकात्मक AI-जनित चित्र

प्रवर्तन निदेशालय की जांच में कथित डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी से जुड़ा एक व्यापक नेटवर्क सामने आया है। एजेंसी के अनुसार संबंधित खातों का संबंध 330 पीड़ित शिकायतों और 20 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में दर्ज 163 एफआईआर से है। कुल रिपोर्टेड नुकसान 417.49 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है। मामले में कानूनी प्रक्रिया जारी है; दोष का अंतिम निर्धारण अदालत करेगी।

डिजिटल अरेस्ट क्या होता है?

इस ठगी में अपराधी स्वयं को पुलिस, सीबीआई, ईडी, कस्टम या अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हैं। वे वीडियो कॉल पर पीड़ित को डराते हैं कि उसका आधार, मोबाइल नंबर या बैंक खाता किसी अपराध में इस्तेमाल हुआ है। इसके बाद कथित जांच, जमानत या खाते के सत्यापन के नाम पर पैसा ट्रांसफर कराया जाता है। भारत में कोई वैध जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को “डिजिटल अरेस्ट” नहीं करती।

जांच में क्या सामने आया?

रिपोर्ट के अनुसार कथित अपराध की रकम कई कंपनियों और बैंक खातों से गुजारी गई। कुछ कंपनियों में साधारण आय वाले लोगों को निदेशक दिखाए जाने का आरोप है। एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि खातों, फर्जी कंपनियों और रकम को आगे भेजने वाले चैनलों का आपस में क्या संबंध था।

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नागरिक तुरंत क्या करें?

  • वीडियो कॉल पर पुलिस या जांच एजेंसी होने का दावा करने वाले व्यक्ति को पैसा न भेजें।
  • ओटीपी, यूपीआई पिन, बैंक पासवर्ड या स्क्रीन-शेयरिंग एक्सेस कभी न दें।
  • संदिग्ध कॉल बंद करके संबंधित विभाग की आधिकारिक वेबसाइट से नंबर लेकर पुष्टि करें।
  • ठगी होने पर तुरंत बैंक को सूचित करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें।
  • मोबाइल नंबर, ट्रांजैक्शन आईडी, स्क्रीनशॉट और कॉल का विवरण सुरक्षित रखें।

समय पर शिकायत से रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की संभावना बढ़ती है। परिवार के बुजुर्ग सदस्यों को भी इस तरीके के बारे में समझाना जरूरी है।

स्रोत: The Indian Express, Hindustan Times

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